ठगी करने वाला खुद ठगी का शिकार हुआ - झपटूराम सेठ की कहानी


  • ठगी करने वाला खुद ठगी का शिकार हुआ - सेठ झपटूराम की बेमानी की कहानी








ठगी करने वाला खुद ठगी शिकार हुआ - सेठ झपटूराम की कहानी
ठगी करने वाला खुद ठगी का शिकार हुआ - सेठ झपटूराम की बेमानी की  कहानी 


हेलो मित्रो आज आपका अपना हेल्प में बहुत-बहुत स्वागत है | सभी दिनों की तरह आज भी आपके लिए बहुत ही अच्छी कहानी आपलोगों के लिए लेकर आया हूँ |
जो आदमी दुसरे लोगो को ठगते हैं, और बेमानी करते हैं | वे आदमी खुद ठगा जाता है कभी किसी को ठगना नहीं चाहिए | क्योंकि बुरा काम का बुरा परिणाम ही होता है छाहे वो कितना बड़ा और महँ सेठ क्यों न हो |
                                                                    इस कहानी में हमलोग ये जानेंगे की एक सेठ था जो की अपने ग्राहक को एक रुपया के सामान को तीन रुपया लेकर अपनी ज्यदा मुनाफा करना चाहता  था | लेकिन, एक दिन ऐसा समय आया की खुद वो सेठ ठगी का शिकार हो गया | तो मित्रो चलिए इस कहानी को आगे पढ़ते हैं |






जोनपुर नगर में एक बनिया रहता था
जिसका नाम झपटूराम था | जेसा उस बनिए का नाम विचित्र था ठीक उसी प्रकार वह काम भी करता था |
वो एक रुपया के किसी भी सामान को तीन रुपया में बेचता था |
                     कुछ दिन तक तो उनसे ग्राहक उनसे ठगते रहे, लेकिन,जेसे-जेसे उस सेठ की भेद खुलने लगा एक-एक करके उसका ग्राहक कम होता गया | एक दिन ऐसा समय भी आया की उसके दुकान पर ग्राहक का आना भी बंद हो गया | अब वह अपनी दुकान पर बैठ कर मक्खियाँ मारा करता था |  लेकिन, ये कब तक चलता...

एक दिन उसके मिलने-जुलने वाले ने उसके दुकान पर ग्राहक न आने का कारन पूछा - उसने साड़ी बात अपने मिलने-जुलने वालो से कही
इस पर एक दुकानदार ने झपटूराम से कहा-भाई आप वाकई झपटूराम हो | उसे ये बात सुनकर अच्छा न लगा उसने मन ही मन सोचा की मुझे ठगी कहा है तो में अब और ठगी बनूँगा और जब पूरा ठगी बन जाऊंगा तो इसी दुकानदार को पहले ठगूंगा | मन में सोचने लगा ठगी का धंधा सिखा कहाँ  जाय |  तभी उसे याद आया बनाराश के पर्शिद्ध ठग पोपटलाल का याद आया | ऐसा सोचकर वह दुसरे दिन ही अपनी बक्से में से एक हज़ार रुपया लिया और बनाराश चल दिए |

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                                         वह ऐसा कंजुष आदमी था की बनाराश जाने के लिए भी पैदल चल दिए | कुछ दिन बाद वह बनाराश पहुँचा | बनाराश शहर के के बाहर उसे एक मंदिर दिखाई दिया | वह मंदिर में ठहरना उचित समझा और मन्दिर के अन्दर चला गया | मंदिर के अन्दर एक विशाल भव्य एक जटा-जूटाधरी बाबा था | वहा सात-आठ ग्रामीण उसकी सेवा में रत थे | कोई पंखा झल रहा था और कोई बाबा के लिए चिलम तैयार कर रहा था | जेसे ही झपटूराम  वहा पहुँचा उसकी सेवा बहत ही अच्छे तरीके  से की |और स्वदीष्ट भोजन कराया | कुछ देर बाद ग्रामीणों और झपटूराम से बातचीत शुरु हो गयी | ग्रामीणों ने झपटूराम को बनाराश आने का कारन पूछा- उसने बनाराश आने का कारन बता दिया | ग्रामीणों ने भी उसे यह बात बताया  की हमलोग  भी यहाँ अपनी-अपनी आभूषनो को बाबा के द्वारा दुगुना करने आये हैं | झपटूराम लालची व्यक्ति था |


उसने सोचा की वह भी अपने रुपया को दुगुना करा लें | | झपटूराम प्रशन्न हो उठा ग्रामीण ने उनसे  बोला - भैया
यह बड़ा सिद्ध पुरुष है |
इसके इशारे पर तो देवियाँ भी नाचती है इसको तो यह देवता को भी वश में कर लेता है | इसे साक्षात् ईश्वर समझो | हमलोग पांच-छः दिन से इस बाबा की सेवा में लगे हैं | तब जाकर यह प्रशन्न हुआ है | और आज अब ये आधी रात को अपनी तपश्या करके हमारे आभुषनों को दुगुना करेंगे | तुम भी अपने रूपये को दुगुना करा लो भाई तुम बड़े भाग्यशाली आदमी हो जो इस वक्त यहाँ आये |
ऐसा अवशर कभी न मिलेगा |  तुम बिना सेवा किये ही अपनी पैसा को दुगुना करा सकते हो |
झपटूराम ने बोला - मेने सुना है की इसी तरह करके बहुत से साधू आदमी को ठग लेते हैं | यह बात ग्रामीणों से कही |
 इस पर एक ग्रामीण जो  की सभी से ज्यादा वृद्ध था वह मुस्कुराकर बोला-कैसी बात करते हो लाला | हम तो इस महापुरुष की कृपा तीन बार लाभ उठा चुके हैं | उसे विश्वाश हो गया और सभी अपना-अपना रुपया और आभूषण साधू के चरणों में रख दिए | साधू तबतक समाधिस्थ हो चुके थे | वृद्ध ग्रामीण बोला अब सभी लोग निशिचित होकर सो जाओ | प्रातः 4  बजे साधू बाबा की समाधी खुलेगी और सभी का सितारा चमकेगा | उस वृद्ध ग्रामीण के इशारे पर सभी लोग सो गए |

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                                                          जब कभी आदमी को प्रशन्नता या चिंता होती है, तो प्रायः नींद हवा की तरह उड़ जाती है | लभगभ झपटूराम की नींद खुल गयी | उसने आसपास सोये हुए वो वृद्ध ग्रामीण को भी देखा तो वो नहीं था | साधू के स्थान पर भी गया साधू भी नहीं था | उसने दुसरे ग्रामीणों को जगाया और वृद्ध आदमी और साधू की गायब हो जाने की सुचना दी यह सुनकर सभी अपना - अपना शिर धुनने लगे और रोने लगे |
झपटूराम ने - ग्रामीणों से कहा - भाई आपलोग तो पहले ही उनसे अपने पैसो को दोगुने करा चुके थे |
उसने बोला 'अजी कहा ' हमें तो वो बुड्ढा बहलाकर लाया था |
अब झपटूराम को सारा रहस्य समझ में आ गया था | तभी उसकी नजर उसके सिरहाने पर पड़ी उसमे एक पत्र था
                      जिसमे लिखा था - 'झपटूराम तुम मेरे पास ठगी का शिक्षा लेने आये थे'
                                                         'सो तुम मेरे काम को देखकर सीख ही जाओगे'

तुम्हारा एक हजार रुपया में -  "गुरु दक्षिणा" के रूप में ले जा रहा हूँ | वो जो वृद्ध  आदमी  था |
वो मेरा बुड्ढा किसान और मेरा शिष्य मनसुखलाल था |
                    पोपटलाल का पत्र पढ़ा तो झपटूराम के पैरों तले जमीन खिशक गयी और उस दिन से शपथ ली की कभी किसी से ठगी नहीं करेगा और उचित मुनाफा लेकर दुकानदारी करेगा |





  • दोस्तों आपको ये कहानी कैसी लगी आप आप अपनी राय को कमेंट के माध्यम दे  जरुर प्रकट करे 









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2 comments

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March 4, 2017 at 8:58 AM ×

मस्त है ये कहानी

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Ajay Saini
admin
March 9, 2017 at 7:23 AM ×

amazing post keep visiting https://kahanikikitab.blogspot.in

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